सवर्णों की चेतावनी: मिशन 27 में भाजपा का खेल बिगाड़ेगी 'यूजीसी ऐक्ट' नीति, केंद्र सरकार की 'नीयत' से भरोसा उठा!
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File Photo:(UGC के प्रदर्शन में शामिल लोग)कैलाश सिंह-
राजनीतिक संपादक
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-राजस्थान का स्थानीय निकाय चुनाव: सवर्ण वोटर भाजपा से नाराज और कांग्रेस से निराश, इसी का नतीजा है 27 फीसदी निर्दलीयों की जीतl
-केंद्र सरकार का काकटेल: एक ओर समान नागरिक संहिता (यूसीसी)और दूसरी तरफ जातीय अपराध संहिता (यूजीसी) कैसे संभव?
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जयपुर/दिल्ली, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का झंडा लेकर 12 साल से चल रही भाजपा (एनडीए) की केंद्र सरकार का विजय रथ मिशन-27 में फंसना तय माना जा रहा हैl राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राजस्थान में हुए स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम ने इसका संकेत दे दिया हैl राजनीति में रुचि रखने वाले इसे भलीभांति समझ गए हैं, क्योंकि केन्द्र सरकार की 'नीति और नीयत' में अंतर सवर्ण ही नहीं, भाजपा के कोर वोटर भी समझ गए हैं, तभी तो 27 फीसदी सीटों पर निर्दलों ने बाजी मारी हैl जबकि भाजपा करीब 35 प्रतिशत और कांग्रेस 34 प्रतिशत सीटों पर (लगभग बराबर) जीत हासिल करके दोनों पार्टियां अपना मेयर बनाने के लिए निर्दलीयों की तरफ़ चातक पंछी सरीखे देख रही हैंl
दरअसल राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव में नाराज सवर्ण और कोर वोटरों ने भाजपा और केंद्र सरकार की 'नीति और नीयत' में फर्क करके 2024 के संसदीय चुनाव की तरह घर बैठने की बजाय निर्दल प्रत्याशी मैदान में लाकर उसकी जीत के साथ अपना दम दिखा दिया हैl यह मिशन-27 के तहत होने वाले पांच राज्यों गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और हिमांचल के विधान सभा चुनावों में भाजपा के विजय रथ के लिए खतरे का संकेत हैl दिलचस्प पहलू ये है कि जिन दलित और जन जातीय वोट के लिए भाजपा सरकार ने यूजीसी के नियमों में फेरबदल किया वही वोटर कांग्रेस की तरफ़ भी ज्यादा गएl वैसे भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाकर अटक गया है, यानी कोर्ट ने स्थगन आदेश से इसके प्रभावी होने पर रोक लगाई हैl सरकार की नीयत साफ़ होती तो उसे वापस ले ली होती या उसमें सार्थक बदलाव करती लेकिन उसने अभी तक कोई पहल नहीं की, लिहाजा सवर्णों ने 'वोट की चोट' से यह संकेत दे दिया है कि हम चुप होकर घर बैठने और किसी अन्य दल में जाने की बजाय निर्दलीयों के सहारे अपना दमखम दिखा दिये हैं, अब संभल जाओl
जातीय अपराध संहिता के सामने कहां टिकेगी समान नागरिक संहिता: पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान आया कि 2028-29 तक देश के एनडीए शासित 21 राज्यों में यूनिफार्म सिविल कोड लागू हो जाएगाl अब सोचनीय विषय है कि (यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता) लागू होने पर यदि यूजीसी ऐक्ट में बदलाव नहीं हुआ तो यह जाति आधारित अपराध संहिता के सामने 'समान नागरिक संहिता' कैसे 'समानता' का द्योतक बनेगा?भाजपा यदि सोच रही है कि लोग यूजीसी और दलित उत्पीड़न वाले मुद्दे कुछ दिन में भूल जाएंगे तो उसे राजस्थान के स्थानीय नगर निकाय चुनाव पर गंभीरता से मंथन करना चाहिएl भाजपा से नाराज लोग कांग्रेस की तरफ़ इसलिए नहीं गए क्योंकि इस दल का भी यूजीसी के मामले में कोई स्टैंड न होने से लोगों में निराशा रहीl यूजीसी आटोनॉमस बॉडी है ऐसी गलतफहमी भी लोगों की दूर हो चुकी हैl यूजीसी शिक्षा मन्त्रालय के अधीन हैl यह सभी जान चुके हैंl यदि सवर्ण वोटर इसी मुद्दे पर अडिग रहा तो वह आगामी विधान सभा और लोकसभा चुनावों में विरोधी दलों को भले न जिता पाए लेकिन भाजपा को हराने में सक्षम होगाl अबकी वह चुप होकर 2024 की तरह घर नहीं बैठेगाl इसका संकेत उसने दे दिया हैl सरकार के पास आज भी थोड़ा वक़्त है जिसमें वह यूजीसी ऐक्ट में फेरबदल करके सवर्णों की नाराजगी दूर कर सकती हैl
हिंदुत्व और जातीयता एक साथ नहीं चल पाएंगे: राजनीतिक विश्लेषक 'एस. पांडे' का मानना है कि भाजपा हिंदुत्व के साथ जातीय भेदभाव करके खुद सनातन संस्कृति को खंडित करने में लगी हैl उसे जातीय तुष्टिकरण से पीछे हटना ही पड़ेगाl यदि वह ऐसा नहीं करती है तो उसे हिंदुत्व के एजेंडे से अलग होना पड़ेगाl निहितार्थ ये कि दोनों एजेंडे एक साथ नहीं चल सकते हैंl


