जौनपुर में सजी शायरी की महफिल, शायरों ने कलाम से बांधा समां
अफजल इलाहाबादी की सदारत और निजामत में शायरों ने पेश किए एक से बढ़कर एक अशआर, जिंदगी, इश्क और समाज के विभिन्न पहलुओं को मिली आवाज
जौनपुर, 16 अक्टूबर (स्वतंत्र वार्ता)। शायरी की महफिल में जब शायर अपने अल्फाज के जरिए जिंदगी के अनुभवों, मोहब्बत, रिश्तों, संघर्ष और समाज की हकीकत को बयां करते हैं, तो सुनने वाले उनके कलाम से जुड़ जाते हैं। ऐसी ही एक साहित्यिक महफिल में शायरों ने अपने बेहतरीन अशआर पेश कर श्रोताओं को सोचने और वाह-वाह करने पर मजबूर किया। महफिल में वरिष्ठ और युवा शायरों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से जिंदगी के विभिन्न रंगों को खूबसूरती से प्रस्तुत किया।
अफजल इलाहाबादी का यह शेर जिंदगी की जटिलताओं और इंसान की शख्सियत को बयां करता है—
“हर किसी की जहां रसाई हो, ऐसा इम्कान भी नहीं हूं मैं। आप जितना मुझे समझते हैं, इतना आसान भी नहीं हूं मैं।”
इस शेर में इंसान की गहराई और उसके व्यक्तित्व को समझने की चुनौती सामने आती है। शायर ने बताया कि किसी व्यक्ति को केवल बाहरी तौर पर देखकर पूरी तरह समझ लेना आसान नहीं है।
हमजा बेलाल ने अपनी शायरी में जिंदगी की अधूरी कहानी, बदलते हालात और सामाजिक हकीकत को आवाज दी। उनके अशआर में रिश्तों, जिम्मेदारियों और नौजवानी के अंदाज की झलक दिखाई दी। उन्होंने कहा—
“अधूरी इक कहानी चल रही है, मुसलसल जिंदगानी चल रही है।
भरोसा भाइयों पर कर रहा हूं, वसीयत तक जुबानी चल रही है।
करेंगे यार तौबा बाद में हम, अभी तो नौजवानी चल रही है।
हमारे खून की कीमत न पूछो, इसी से राजधानी चल रही है।”
इन अशआर में जिंदगी की निरंतरता, पारिवारिक रिश्तों, युवावस्था और व्यवस्था से जुड़े सवालों को शायराना अंदाज में पेश किया गया।
शिवसागर सहर ने अपनी शायरी में आवारगी, फाकाकशी और शायर की रोजमर्रा की चुनौतियों को कुछ इस अंदाज में बयां किया—
“मेरी आवारगी, फाकाकशी सबसे अलग, शायरी के साथ अब खाने-कमाने के लिए, नौकरी तो हो, मगर हो नौकरी सबसे अलग।”
वहीं हर्षित मिश्रा ने अपने बेबाक अंदाज में कहा—
“मुझको कुछ मत करने देना, वरना कुछ भी कर सकता हूं।”
उनके इस शेर में आत्मविश्वास और चुटीले अंदाज की झलक दिखाई दी। रुबीना अयाज ने इश्क के एहसास को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करते हुए कहा—
“क्या कहा इश्क हो गया तुमको, अब तो खाना खराब होना है।”
उमर इजहार ने पिता के त्याग और परिवार के लिए उनके संघर्ष को अपने अशआर में जगह दी। उन्होंने कहा—
“गिरवी रखकर अपने सपने बाबूजी, ले आते थे ख्वाब हमारे बाबूजी।”
इस शेर में पिता के त्याग, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और बच्चों के भविष्य के लिए किए जाने वाले संघर्ष की मार्मिक तस्वीर सामने आती है।
राशिद राहत ने अपनी शायरी में पहचान और नाम की अहमियत को रेखांकित करते हुए कहा—
“इससे बढ़कर जो बताओगे, इजाफी होगा, बस मेरा नाम बता देना ही काफी होगा।”
उनके इस शेर में अपनी पहचान और व्यक्तित्व पर भरोसे का भाव नजर आया।
महफिल में अफजल इलाहाबादी ने निजामत की जिम्मेदारी निभाई, जबकि राशिद राहत ने सदारत की। कार्यक्रम में सपा नेता उदयभान मौर्य,फैसल हसन तबरेज़, परवेज आलम भुट्टो, सरफराज खान, अरशद खान पूर्व विधायक, सलमान शेख आज़म ज़ैदी नवीन मिश्रा मनीष गुप्ता, डर क्षितिज शर्मा,, विवेक उपाध्याय, शेख सिराजुद्दीन देदारगंज, शकील ड्रग, इरशाद मंसूरी, आरिफ हबीब, सैय्यद हसनैन कमर 'दीपू', कलीम अहमद, निखिलेश सिंह, किरण सोनी, शिवसागर सहर, साहिल इलाहाबादी, रेहान जैस्मीन, अनवरुल हक दुलारे और अब्दुल हक अंसारी सहित अन्य शायर मौजूद रहे।
इस साहित्यिक आयोजन में पेश किए गए अशआर ने जिंदगी के अनुभवों, सामाजिक सरोकारों, पारिवारिक रिश्तों, इश्क और इंसानी फितरत के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा। शायरों ने अपने-अपने अंदाज में शब्दों के माध्यम से भावनाओं को अभिव्यक्त किया और शायरी की परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।









