कांग्रेस का संगठन डांवाडोल: भाई-बहन' के बीच फंसी पार्टी नेतृत्व विहीन नज़र आने लगी है!
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कैलाश सिंह-
राजनीतिक संपादक
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-'वन्दे मातरम्' के 150 साल पूरे होने पर आठ दिसम्बर को संसदीय परम्परा के मुताबिक सदन में चर्चा की शुरुआत प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने की, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मुख्य वक्तव्य देने नहीं आये राहुल गाँधी, उनकी बजाय प्रियंका गाँधी ने परम्परा का निर्वहन कियाl
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दिल्ली/लखनऊ, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l बीते सोमवार आठ दिसम्बर को लोकसभा में संसद सत्र के दौरान 'वन्देमातरम्' के 150 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय परम्परा के मुताबिक इसपर चर्चा की शुरुआत की, लेकिन सदन के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने वक्तव्य परम्परा को दरकिनार ही नहीं किया, बल्कि वह सदन में भी नहीं रुकेl उनके स्थान पर प्रियंका गाँधी ने मुख्य वक्तव्य देकर यह जाहिर कर दिया कि वह राहुल के मुकाबले बेहतर वक्ता हैंl बात कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर की जाए तो यह पार्टी अरसे से नेतृत्व विहीन नज़र आ रही हैl या यूं कहें कि पार्टी के तमाम नेता और कार्यकर्ता 'तिराहे' पर खड़े होकर दो धड़े में नज़र आ रहे हैंl हालांकि अब सोनिया गाँधी बेबस दिखने लगी हैंl पार्टी को प्रियंका गाँधी 'प्राइवेट कम्पनी' की तरह चला रही हैं तो राहुल गाँधी 'एनजीओ' सरीखे संचालित कर रहे हैं,किसी भी फैसले के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे को इन्हीं शीर्ष नेतृत्व का निर्देश लेना पड़ता हैl पार्टी सुप्रीमों के तौर पर इन भाई- बहन से मिलने को उनके निजी सचिवों क्रमशः 'अलंकार और संदीप' से देशभर के पार्टी नेताओं को अनुमति लेनी पड़ती हैl सही मायने में संगठन भी इन्हीं दोनों 'डीह' के भरोसे चल रहा हैl पार्टी का संगठन इन दोनों की चाकी में पिस रहा है, वे एक- दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ते हैंl
बेहतर वक्ता के तौर पर इस तरह राहुल गाँधी पर भारी पड़ती हैं प्रियंका वाड्रा गाँधी: इस प्रकरण को समझने के लिए बीस साल पीछे यानी 2004 से इतिहास में झांकना होगा, क्योंकि उसी दौरान राहुल गाँधी ने संसदीय चुनावी राजनीति में कदम रखा थाl उसी समय कांग्रेस का एक गुट प्रियंका गाँधी को पार्टी का नेतृत्व देने की मांग कर रहा थाl इसका प्रमाण अमेठी के गौरीगंज में दीवारों ने दिया जहां लिखा था कि 'अमेठी का डंका- बिटिया प्रियंका'l इस तरह राहुल से छोटी प्रियंका को लोग अधिक योग्य मानते रहे, लेकिन सोनिया गाँधी ने बेटे को ही तरजीह दी,हालांकि राहुल उसी तरह राजनीति में नहीं आना चाहते थे जिस तरह उनके पिता पूर्व पीएम राजीव गाँधी को राजनीति पसन्द नहीं थीl जबकि प्रियंका राजनीति में आने को अपने चाचा संजय गाँधी की तरह इच्छुक थींl
एक बानगी देखिये जिसमें प्रियंका गाँधी का वक्तव्य हिट हुआ: रायबरेली से भारतीय जनता पार्टी से अरुण नेहरू चुनाव लड़ रहे थेl यहां प्रियंका गाँधी केवल एक जनसभा में भाषण देती हैं कि 'क्या आप लोग मेरे पिता जी को धोख़ा देने वाले को जिताना चाहते हैं', इस एक भाषण ने अरुण नेहरू को हरा दियाl तब पार्टी के एक वर्ग ने प्रियंका को राजनीति में लाने पर जोर दिया थाl हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें आधे यूपी की जिम्मेदारी दी गई थीl तब राहुल गाँधी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थेl वह खुद अपना चुनाव अमेठी से हार गए और पार्टी को 80 में से मात्र एक सीट मिली थीl इसी तरह 2022 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में 403 सीटों में से पार्टी को महज दो सीट पर जीत मिली वह भी प्रत्याशी अपने बल पर जीते थेl
हर दल में होती है गुटबाजी: सभी दलों में गुटबाजी होती है, लेकिन पार्टी नेतृत्व सम्भाल लेता हैl उदाहरण के तौर पर भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में मात मिली वह भी पूर्व अध्यक्ष एवं गृहमंत्री अमित शाह व जेपी नड्डा के चलते, लेकिन मोदी व संघ ने गतिरोध दूर करके हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, जम्मू के बाद बिहार में फतह हासिल कर लियाl यहां अमित शाह ने फ़िर अपनी नेतृत्व क्षमता का बेजोड़ प्रदर्शन कियाl जबकि राहुल गाँधी ने तो महागठबंधन का धर्म भी ठीक से नहीं निभाया, जिसका नतीजा बम्पर हार के रूप में मिलाl
कांग्रेस में नेतृत्व के साथ वक्ताओं का अकाल: सोमवार आठ दिसम्बर को लोकसभा में पार्टी की तरफ़ से प्रियंका का वक्तव्य यह साबित करता है कि समूची पार्टी नहीं चाहती है कि राहुल गाँधी कहीं भी बोलें या भाषण दें, क्योंकि वह जहां भी भाषण देते हैं वहां सब 'गुण- गोबर' यानी वोट के साथ समर्थकों के घटने की सम्भावना बढ़ जाती हैl प्रियंका के भाषण से वोट भले ही न बढ़े लेकिन कम भी नहीं होताl लोकसभा में दिया गया उनका वक्तव्य यह भी संकेत दे रहा है कि अब पार्टी के संगठन में 'प्रियंका गाँधी' राहुल गाँधी पर भारी पड़ सकती हैंl इनकी पहली परीक्षा कर्नाटक में होगी जहां प्रियंका के समर्थक ज्यादा हैंl
कांग्रेस में 'संदीप और अलंकार' जैसे लोग पार्टी के डीह बने: इन दिनों कांग्रेस पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं के लिए शीर्ष नेतृत्व वाले 'भाई- बहन' से मिलने या किसी आदेश, निर्देश के लिए संगठन के लोगों को उपर्युक्त दोनों 'डीह' की परिक्रमा उसी तरह करनी पड़ती है जिस प्रकार गांवों में आज भी डीह पूजन के बाद ही किसी अन्य देवालय में दर्शन - पूजन के लिए जाया जाता हैl प्रियंका गाँधी के निजी सचिव या परिचारक अथवा 'चारण वाचक' जो भी समझिये, बग़ैर उनके संकेत के कोई भी इस 'हाई कमान' से नहीं मिल सकता हैl एक तरह से संगठन संचालन का यही ठेकेदार है जो समूची व्यवस्था 'प्राइवेट कम्पनी' सरीखे चलाता हैl खुद उसी से भी मिलने वालों को लग्जरी स्टाइल अपनानी पड़ती हैl इसके विपरीत 'पार्टी के पहले हाई कमान' राहुल गाँधी से मिलने वालों को दीनहीन बनकर यानी कपड़ों व चप्पल -झोले के साथ अलग रूप धरके जाना पड़ता है, जिसका परीक्षण उनका कथित निजी सचिव 'अलंकार' करता हैl अर्थात इस 'डीह' पर भी मत्था टेकने के दो माह बाद की डेट हाई कमान से मिलने को दी जाती हैl,,, क्रमशः

