राजनीतिक इम्तिहान: भाजपा तो संभल गई पर विपक्षी पार्टियां जातिवाद के जाल में ही उलझी रह गईं!
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कैलाश सिंह-
राजनीतिक संपादक
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-यूपी विधान सभा 2022 और 24 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का अहंकार टूटा, इसके बाद उसे समझ आ गया कि बग़ैर 'संघ' के उसका वजूद शून्य हैl
-विपक्षी पार्टियां खासकर कांग्रेस और सपा के साथ आरजेडी बिहार में मुंह की खाने के बाबजूद जातिवाद के जाल में फंसी पड़ी हैंl
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दिल्ली/लखनऊ/कोलकाता, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l बिहार में हुए विधान सभा चुनाव परिणाम ने जो राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश दिया है, उसमें 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन' (राजग) तो फास्ट ट्रैक पर चलता नज़र आ रहा है, लेकिन 'इंडिया गठबंधन' की रेल पटरी से उतर चुकी हैl उत्तर प्रदेश की चुनावी परीक्षा अभी एक साल दूर है, लेकिन यहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अभी से भाजपा को 'वाक ओवर' देती नज़र आ रही हैंl इसी तरह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 'एसआईआर' के जाल में उलझी हैl यहां तो चुनावी इम्तिहान अगले साल यानी कुछ ही महीनों दूर रह गया हैl यूपी में 'कोडीन कफ़ सिरप' मामले में जिस तरह सपा और कांग्रेस नेता जातिवादी मुद्दे को तलाशते नज़र आ रहे हैं उससे यही जाहिर हो रहा है कि उनके हाथ से 'मुस्लिम वोट बैंक' भी फिसल जाए तो हैरत नहीं होगी, क्योंकि यहां भी असदुद्दीन ओवैसी तुरुप का पत्ता साबित होंगेl
राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिये से देखें तो दिल्ली के तख़्त का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही गुजरता हैl यह बात 2024 के लोकसभा चुनाव में साबित भी हो चुकी हैl उस दौरान भाजपा 'अहंकार में मदमस्त' थीl उसके लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ(आरएसएस) कोई मायने नहीं रखता थाl तभी तो बीच चुनाव में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का बयान आया था कि हम अकेले सक्षम हैंl हमें किसी अन्य संगठन की जरूरत नहीं हैl यह अहंकार यूपी में ऐसा टूटा कि पार्टी केन्द्र में स्पष्ट बहुमत से दूर रह गईl भाजपा के कथित हाई कमान के इशारे पर यूपी में सीएम योगी आदित्यनाथ को हटाने को 2022 में शुरू हुई गुटबाजी ने सपा को पीडीए बनाने का रास्ता प्रशस्त कर दियाl दो फाड़ होती दिखी भाजपा की आंतरिक कलह को निरंतर उजागर करती गई, जिसका परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखाl यहां की 80 में से 40 सीट भी भाजपा नहीं जीत सकीl
सौ साल पूरे करने वाला दुनिया के सबसे बड़े संगठन संघ का रास्ता केवल राष्ट्रवाद हैl इसका चुनावी राजनीति से कोई लेना देना नहीं हैl यह बग़ैर भाजपा के जब सौ साल पूरे कर चुका है तो आगे भी चलता रहेगा, लेकिन इसकी जरूरत भाजपा को है, क्योंकि इसके 'स्वयंसेवक' भारत ही नहीं, दुनिया भर में फैले हैंl भाजपा और संघ के बीच गतिरोध पीएम मोदी की सक्रियता से दूर हुआl बेहतरीन तालमेल का नतीजा हरियाणा से शुरू हुआ तो जम्मू, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में फतह के रूप में सामने आयाl भाजपा में संघ सीधे कोई दखल नहीं देता हैl वह केवल सांगठनिक ढांचा मजबूत रखता हैl इसके लिए वह संवाद की लम्बी प्रक्रिया को अपनाता हैl इसके स्वयंसेवक चुनावी प्रचार नहीं करते, बल्कि वह लोगों में राष्ट्रवाद की भावना को जगाते हैंl
गठन के समय ही बिखरने लगा था इंडिया गठबंधन: जब इंडिया गठबंधन का निर्माण हो रहा था तभी वह बिखरने लगा थाl इसमें शामिल पार्टियां खुदमुख्तारी के चक्कर में अपनी ढपली- अपना राग अलापने लगींl कोई भी कांग्रेस और उसके नेता राहुल गाँधी का नेतृत्व स्वीकारने को तैयार नहीं हुआl नतीजा 2024 के लोकसभा चुनाव में सामने इस तरह आया कि चार सौ पार का नारा देने वाली भाजपा को को दो बैशाखियों का सहारा लेना पड़ा, फ़िर भी इंडिया गठबंधन सरकार बनाने में फेल हो गयाl वह तभी से इंतजार में है कि कब नीतीश और नायडू उनकी तरफ़ झुक जाएं और मोदी सरकार गिर जाएl उसी इंतजार में यह गठबंधन बिहार भी हार गया, फ़िर भी वह जातिवाद से बाहर नहीं हो पायाl
सपा- कांग्रेस को लगा कि कोडीन कफ़ सिरप रूपी बटेर उनके हाथ लग गया: मतदाता गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे बेदम मुद्दे को लेकर आगे बढ़ रहीं दोनों पार्टियों ने बीएलओ की हो रही मौतों को दर किनार करते हुए 'यूपी में कोडीन कफ़ सिरप' प्रकरण को बटेर सरीखा मानकर उसमें बाहुबली,अपराधी और जाति खोजनी शुरू कर दींl जबकि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस मामले में पहले ही सख्ती शुरू कर दी थीl पूर्वांचल में इस प्रकरण के मुख्य आरोपी शुभम जयसवाल के आये वीडियो वाले बयान ने दोनों पार्टियों की हवा निकाल दीl उसने स्पष्ट कर दिया कि कोडीन कफ़ सिरप नशीली होती है, उसे जहरीली कहना गलत हैl इसका प्रोडक्शन और विक्रय सरकारी मानक से होता हैl दरअसल इस मामले में 'बल्क में तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग' की पड़ताल जांच एजेंसियां कर रही हैं, जिन नेताओं पर खुद आय से अधिक संपत्ति रूपी तलवार झूल रही है वह कोडीन कफ़ सिरप से जातिवादी कैरम की गोटी खेल रहे हैंl
तेजस्वी की तरह अखिलेश के सामने भी सवाल आयेगा कि कब तक मुस्लिम दरी बिछायेगा: बिहार में सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव और भाजपा के सीएम योगी आदित्यनाथ अपने दलों के प्रचार में खूब सभाएं किएl योगी का हिंदुत्व कार्ड और बुलडोजर वहां छा गया, लेकिन तेजस्वी और राहुल गाँधी की तरह अखिलेश के पास भी असदुद्दीनओवेसी द्वारा आरजेडी सुप्रीमों पर आजमाए गए 'दांव' कि- कब तक मुस्लिम दरी बिछाएगाl क्यों नहीं, किसी मुस्लिम को डिप्टी सीएम का चेहरा महागठबंधन ने घोषित किया? यही संभावित सवाल यूपी में सपा और कांग्रेस को साल रहा हैl अखिलेश यादव तो अपनी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे आजम खान के पक्ष में कभी खड़े नज़र नहीं आयेl भाजपा तो गुटबन्दी और आंतरिक कलह से उबरकर संघ से बेहतर तालमेल करके उसकी सलाह से 'मिशन 2027' पर लग गई हैl इसका उदाहरण हाल ही में लखनऊ में हुई बैठक से लिया जा सकता हैl संघ-संगठन और पार्टी की बैठक में हुए निर्णय को लेकर कोई भी बयान बाहर नहीं आया, जिसका इंतजार मीडिया करता रह गयाl
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