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पश्चिम एशिया महायुद्ध फेज 2: कहीं ट्रम्प की आर्मी का ईरान में पहुंचना मैदान से पहाड़ियों पर उल्टी छलांग तो नहीं साबित होगी! Tahalka Samvad

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 पश्चिम एशिया महायुद्ध फेज 2: कहीं ट्रम्प की आर्मी का ईरान में पहुंचना मैदान से पहाड़ियों पर उल्टी छलांग तो नहीं साबित होगी! 


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कैलाश सिंह-

राजनीतिक संपादक

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-नेटो के 32 देशों ने अमेरिका का साथ छोड़ा, वह मानते हैं कि ईरान युद्ध अमेरिका का फैसला हैl इससे यूरोपीय देशों यानी दुनिया के सबसे बड़े नेटो सैन्य गठबंधन का कोई लेनादेना नहींl दूसरी तरफ ईरान हर मुकाबले को तैयार हैl उसके निशाने पर अब खाड़ी देशों में अमेरिका से जुड़े शैक्षणिक संस्थान भी आ गए हैंl


-युद्ध के 24 वें दिन अमेरिका के पहले पांच दिन वाली सीज फ़ायर की घोषणा हवाई साबित हुई, फ़िर 10 दिन की मोहलत से यही लग रहा है कि ट्रम्प का लक्ष्य ईरान के 'खार्ग आईलैंड' पर कब्जा करना या फ़िर नष्ट करने का हैl ईरान बग़ैर विराम युद्ध को जारी रखे है, वह समुद्री रास्ता 'जल डमरू मध्य' रोककर खाड़ी देशों को बता रहा तुम्हारे दादा हम हैं, अमेरिका नहींl युद्ध का दायरा बढ़ने से बाकी दुनिया संशय और आर्थिक संकट में हैl

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दिल्ली/लखनऊ, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l पश्चिम एशिया में ईरान पर अमेरिका और इजराइल का संयुक्त हमला जब 28 फरवरी को हुआ था तब रक्षा विशेषज्ञों व कूटिनीतिज्ञों का अनुमान था कि यह युद्ध हफ़्ते भर से ज्यादा नहीं चलेगा, लेकिन इस महायुद्ध ने एक महीना पार कर लिया हैl अब जमीनी लड़ाई की योजना इसे दूसरे चरण में पहुँचने का संकेत दे रही हैl इधर ईरान अपनी तबाह हो चुकी एयरफोर्स और नेवी के साथ मारे जा चुके सुप्रीम लीडर व अन्य नायकों के बावजूद ड्रोन हमलों से अमेरिका और इजराइल के महंगे आयुध को नष्ट करने के साथ खाड़ी देशों में अमेरिकी एयर बेस व अन्य सैन्य ठिकानों पर हमलावर बना रहाl इस महायुद्ध के फैलते दायरे के चलते पेट्रोलियम उत्पादों वाली ऊर्जा को बचाने के लिए थाईलैंड, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका समेत तमाम देश 'वर्क फ्राम होम' (कोरोना के लॉक डाउन जैसा) की तरफ़ बढ़ रहे हैंl पाकिस्तान की हालत पहले से भी बदतर हो चली हैl दिलचस्प तो ये है कि हमारे देश भारत में विपक्षी पार्टियां राष्ट्रहित में एकजुटता की बजाय अफवाहों को बल देने में जुटी हैंl यानी आर्थिक मंदी के साथ महंगाई अंगड़ाई ले चुकी हैl इस संकट से बचाव के लिए जितनी जिम्मेदारी किसी देश की सरकारों की होती है उतनी ही वहां के हर व्यक्ति की होती हैl


अमेरिकी बंकर बस्टर बम ईरान के इस्फ़हाम शहर पर गिरा: नौ कुंटल वजनी बंकर बस्टर बम से अमेरिका ने ईरान के उस बड़े इस्फ़हाम शहर पर 31 मार्च को हमला किया जिससे जाहिर होता है कि उसने ईरान के रक्षा पावर सेंटर को नष्ट करने का मंसूबा पहले ही बना लिया थाl दूसरी तरफ ईरान भी अमेरिका की उन दो मिसाइलों को नष्ट करने का दावा किया है जिनकी कीमत 500 करोड़ आंकी जा रही हैl इस तरह यह युद्ध अब नई दिशा में जा रहा हैl अब सिविलियन पर हो रहे हमले महायुद्ध के फेज 2 की तरफ़ बढ़ने के संकेत दे रहे हैंl इधर अमेरिका भी अपनी आर्मी को ईरान के दुर्गम इलाकों में उतार रहा है, लेकिन उसे पता होगा कि ईरान के पहाड़ी इलाकों में अमेरिकी फौज को नाकों चने चबाने होंगेl वहां के रेगिस्तान में तापमान 50 डिग्री से अधिक होना और पहाड़ों पर बैठे ईरानी सैनिकों से लड़ना आसमान से बरसती आग पर पत्थर उछालने जैसे होगाl भारत इस कठिन परीक्षा से कारगिल युद्ध के समय गुजर चुका हैl


अमेरिकी युद्ध विराम कहीं छलावा तो नहीं: विगत 28 फरवरी को ईरान से अमेरिका, इजराइल का शुरू हुआ संयुक्त युद्ध हफ़्ते भर से ज्यादा चलने का अनुमान जिस तरह गलत साबित हुआ उसी तरह अमेरिका का पांच दिन, फिर दस दिन का युद्ध विराम भी छलावा साबित हुआl इस

 महायुद्ध की आग में 32 दिन से जल रहे पश्चिम एशिया के ताप से समूची दुनिया भी झुलस रही हैl आर्थिक मंदी का भयानक खतरा अब अपना असर दिखाने लगा हैl दुनिया में कच्चे तेल की कमी और पेट्रोलियम उत्पादों के बढ़ते मूल्य ने इस ऊर्जा संकट की भयावहता की गवाही देने लगा हैl दुनिया के अधिकतर देशों में ऊर्जा संकट से निबटने के उपायों पर काम चलने लगा हैl हमारे देश में पेट्रोल पंप पर किरोसिन और बाजारों में गैस चूल्हे सरीखे 'डीजल चूल्हे' बिकने लगे हैंl आमजन भी लकड़ी वाले चूल्हे का विकल्प बनाकर चल रहे हैंl भला हो हमारी सरकार का जिसने खुद का फायदा दरकिनार करके गैस तेल के मूल्यों पर नियंत्रण रखे हैl


अमेरिका का ईरान से डील का वो पांच बड़ा दावा: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा था कि ईरान के एक बड़े नेता से हमारी बातचीत चल रही है, जिसकी पहल भी उन्होंने ही की हैl रायटर न्यूज एजेंसी के मुताबिक यह बातचीत ईरान के नये सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई से नहीं, बल्कि वहां की संसद के अध्यक्ष मो.बागेर से हो रही हैl युद्ध के 24 वें दिन से ट्रम्प जो पांच बड़े दावे करते आ रहे हैं, उनमें पहला यह कि युद्ध विराम के बाद अमेरिका और ईरान मिलकर स्ट्रेट ऑफ हार्मूस पर संयुक्त रूप से नियंत्रण कर सकते हैंl दूसरा अमेरिका अब ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देगाl तीसरा यदि ईरान से डील नहीं हुई तो अमेरिका बग़ैर रुकावट ईरान पर अनवरत तेज हमले करेगाl चौथा ये समझौता ईरान की पहल पर हो रहा हैl पांचवा दावा ये कि लगातार हो रही बातचीत से दोनों देशों में डील की संभावना प्रबल हैl इस दावे में एक बात तो साफ है कि पिछले 32 दिनों में लगातार पेट्रोलियम उत्पादों का संकट बढ़ता गया हैl दुनिया के शेयर बाजार औंधे मुंह गिरते जा रहे हैंl आर्थिक संकट घने बादलों की तरह दुनिया को अपने आगोश में लेता जा रहा हैl


अमेरिकी दावे पर ईरान का इनकार, भारत पर भरोसा और मिडिल ईस्ट में युद्ध के मायने: अमेरिका, इजराइल के ईरान से युद्ध में भारत उसी तरह संतुलित है जैसे रूस -युक्रेन युद्ध में उसने संतुलन बनाये रखा हैl यानी आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए 'युद्ध नहीं, बुद्ध' के संदेश वाले फार्मूले पर चलना एक मात्र रास्ता है,जिसे भारत अपनाये हुए हैl युद्ध जरूरी होने और इसे टालने का भी हालिया उदाहरण 'ऑपरेशन सिंदूर' के रूप में देखा जा सकता हैl मिडिल ईस्ट में पिछले 32 दिन से जारी महायुद्ध में शामिल तीन देशों में अमेरिका को महीने भर खुद उसका लक्ष्य नहीं मालूम था, लेकिन 'ईजराइल - ईरान' अपने अस्तित्व के लिए मरने- मारने पर आमादा हैंl ईजराइल को पता है कि हमास, फिलिस्तीन से युद्ध के दौरान भी ईरान ने 'प्राक्सी यानी छद्म' हमले और हथियार से उसके खिलाफ अहम भूमिका अदा की थीl इसीलिए वह ईरान के बढ़ते परमाणु परीक्षण और यूरेनियम को समाप्त करने और वहां की लीडरशिप को बदलने पर आमादा रहा हैl जबकि ईरान अपने लीडर अयातुल्ला खामेनेई के मारे जाने के बाद से ही संकल्प कर लिया कि हम तो मरने के साथ बर्बाद हो ही रहे हैं लेकिन पश्चिम मध्य एशिया के उन अमेरिकी ठिकानों को भी तबाह और बर्बाद कर देंगे जिसके बल पर वह दुनिया पर दादागिरी करता हैl यही कारण है युएई के सात देशों समेत मुस्लिम देशों पर ईरानी हमले होने काl स्ट्रेट ऑफ हार्मूस यानी समुद्र में जल डमरू मध्य क्षेत्र पर ईरानी प्रतिबन्ध का सीधा असर अमेरिकी अर्थ व्यवस्था का गला ईरान के जबड़े में फंस गयाl दुनिया के देशों की भी सांसें थमने लगी हैंl ईरान यही चाहता भी है कि दुनिया अमेरिका पर दबाव डालेl क्योंकि इसके चलते दुनिया भर के देशों में गैस और पेट्रोलियम उत्पादों को लेकर हाहाकार मच गया हैl


महायुद्ध में भारत की भूमिका: भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के व्यापारिक और राजनीतिक सम्बन्ध जितने इजराइल से हैं उतने ही ईरान,अमेरिका और रूस समेत दुनिया के तमाम देशों से हैंl यही कारण है कि भारत किसी के फटे में टांग अड़ाने की बजाय राष्ट्रवाद और देश के विकास वाली नीति पर चल रहा हैl 


ईरान के विरोध में खाड़ी देश और समर्थन में सामने आये तीन आतंकी संगठन: खाड़ी देश ईरान की बजाय अमेरिका को अपना दादा मानते हैं जबकि नेटो के 32 देश तटस्थ भूमिका में आ चुके हैंl ईरान खाड़ी देशों के उन ठिकानों पर हमला करता आ रहा है जहां अमेरिकी सैन्य अथवा एयर बेस हैंl अब उसने सिविलियन के साथ शैक्षणिक संस्थानों पर भी हमले की चेतावनी जारी कर दी हैl उसकी सहायता में उसके ही पाले गए आतंकी संगठन 'हूती, हमास, हिन्बुल्ला' के आने से महायुद्ध विकराल रूप लेता जा रहा हैl

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