पश्चिम बंगाल विस चुनाव: डर के साये में 'विक्टिम कार्ड' खेलने को छटपटा रही हैं ममता बनर्जी!
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कैलाश सिंह
राजनीतिक संपादक
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-पश्चिम बंगाल का चुनावी महाभारत: देश के पांच राज्यों में चुनाव चल रहे हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में जो हो रहा वह कल्पना से परे हैl इस प्रदेश में विधान सभा चुनाव की तारीख जैसे- जैसे नजदीक आ रही है उससे अधिक रफ्तार में चुनावी महाभारत के नियम तार- तार हो रहे हैंl पहली बार किसी राज्य में न्यायिक अधिकारियों को कथित तौर पर घेरने या बंधक बनाने की घटना ने देश को शर्मसार कर दिया हैl पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी 'विक्टिम कार्ड' खेलने के लिए छटपटा रही हैंl यही कारण है कि वह भाजपा की केन्द्र सरकार पर प्रदेश में अपरोक्ष राष्ट्रपति शासन लगाने की तोहमत लगा रही हैंl
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कोलकाता, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l एक फिल्म का डायलाग है- 'जो डर गया समझो वह मर गया', लेकिन जिसका धंधा 'डर' के बलबूते चलता है और वह खुद जब डर जाए तो फिर वह व्यक्ति कुछ भी कर गुजरता हैl उसे समाज, कानून, संविधान किसी का भय नहीं होता हैl यही स्थिति पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी की हो गई हैl उनपर चुनावी पूंजी लुटने, विखरने और मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के क्षतिग्रस्त होने का भय ऐसा सवार हो गया है कि उनके इशारे पर ही 'एसआईआर' में लगे न्यायिक अधिकारियों को टीएमसी कार्यकर्ताओं के साथ भीड़ ने जिस तरह घेर लिया अथवा कथित तौर पर बंधक बना लिया, यह उनके डर को प्रदर्शित करता हैl ऐसी स्थिति देश में शायद पहली बार उत्पन्न हुई हैl हलांकि 1995 में यूपी की पूर्व सीएम मायावती खुद सपा नेताओं- कार्यकर्ताओं से घिरीं थीं जिन्हें अपनी ही जान के लाले पड़ गए थेl वह मामला राजनीतिक था लेकिन न्यायिक अफसरों का प्रकरण देश में इसलिए भी अनोखा है क्योंकि मालदा कांड ने उन न्यायिक अफसरों और उनके परिवारों की सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय को चिंता में डाल दिया हैl दूसरी तरफ सत्तारूढ़ दल टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी भारतीय जनता पार्टी से लड़ते- लड़ते सुप्रीम कोर्ट को चुनौती दे बैठी हैंl वह केन्द्र सरकार पर प्रदेश में अपरोक्ष राष्ट्रपति शासन लगाने की तोहमत लगा रहीं हैं ताकि सच में ऐसा हो जाए तो उन्हें 'विक्टिम कार्ड' खेलने का आखिरी मौका मिल जाए और वह मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को क्षतिग्रस्त होने से बचा ले जाएंl इसको लेकर वह हिमायूँ कबीर से अधिक असदुद्दीन ओवैसी से भी अधिक सहमी हैंl यानी 'डर' के हथियार से ममता बनर्जी पिछले डेढ़ दशक से स्थापित सत्ता वाले अपने 'राजनीतिक सम्राज्य' को उसी के जरिए बचाने की आखिरी कोशिश में लगी हैंl
पश्चिम बंगाल में ग्राउंड रिपोर्टिंग में लगे पूर्वोत्तर के 'तहलका संवाद' चीफ रिपोर्टर- संतोष कुमार सिंह के मुताबिक इस प्रदेश में विधान सभा के वर्ष 2021 वाले चुनाव के बाद जो हिंसा हुई थी उसने पाकिस्तान, बांग्लादेश की चुनावी हिंसा की यादें ताज़ा कर दी थीl बावजूद इसके भाजपा की केन्द्र सरकार ने यहां राष्ट्रपति शासन की सिफारिश नहीं की थीl जबकि इस पार्टी के तमाम कार्यकर्ताओं, नेताओं को मारा गया, उनके घर जलाये गए, महिलाओं पर अत्याचार हुए, तमाम लोग पलायन कर गए थेl फ़िर भी राष्ट्रपति शासन की मंजूरी नहीं मिलीl भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने ऐसा धैर्य क्यों बनाये रखा यह तो नहीं पता लेकिन हर वर्ग के जो मतदाता संपर्क में आये उनका एक ही जवाब है कि ममता बनर्जी के सामने किसी की नहीं चलने वाली हैl भाजपा समेत विपक्षी पार्टियां चाहे जो हों उन्हें टीएमसी से टक्कर लेने के लिए उसी के अंदाज़ में लड़ना होगा, अन्यथा पब्लिक या वोटर मार खाकर वोट नहीं देने जाएगाl
राजनीतिक विश्लेषक 'एस पाण्डे' एवं 'एस एन मिश्र' का आकलन है कि अब ममता बनर्जी अपने ही बिछाये जाल में अवश्य फंसेंगी जो आज देखने को मिल रहा हैl ममता के तीसरे शासनकाल में आर्जिकर मेडिकल कॉलेज की प्रशिक्षु डॉक्टर की घटना को प्रदेश ही नहीं, समूचे देश के लोग भी नहीं भूले होंगेl कोयला समेत कई घोटालों को लेकर ईडी की कार्रवाई में बाधा डालने डीजीपी को साथ लेकर पहुंचीं ममता बनर्जी का वह रूप भी लोगों को याद होगाl सीबीआई के साथ हथापाईं की स्थिति पर एफआईआर तक की आई नौबत भी आमजन के जेहन में कौंध रही होगीl ममता बनर्जी ने शिशुपाल की तरह आखिरी गलती न्यायिक अधिकारियों को कथित तौर पर घेरने या बंधक बनाने का जो कारनामा मालदा में किया है उसकी सजा कोर्ट दे या न दे पर यहां की जनता अवश्य देगी, ऐसा महसूस होने लगा हैl 'तहलका संवाद' रिपोर्टर संतोष से ग्राउंड जीरो पर मिले वोटरों में खासकर मुस्लिम समुदाय के लोगों का रुझान हुमायूँ कबीर और असदुद्दीन ओवैसी की तरफ़ होने से जाहिर होता है कि ममता बनर्जी का मुस्लिम ध्रुवीकरण नामक किला दरक रहा हैl
जब ममता बनर्जी के गले की फांस बना एसआईआर: पश्चिम बंगाल में गहन मतदाता पुनरीक्षण ने ममता बनर्जी के फर्जी वोट बैंक का लगभग खात्मा कर दिया हैl इसके बचाव में ही उन्होंने चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोला थाl प्रदेश के अधिकतर अफसर टीएमसी के कैडर सरीखे काम करते हैंl इसका एहसास विगत बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर लिया, जब गुंडों ने एसआईआर में लगे न्यायिक अधिकारियों को घेरकर बंधक लिया थाl मौके पर प्रदेश का सुरक्षा बल साढ़े नौ घंटे बाद तब पहुंचा जब केंद्रीय सुरक्षा बल ने पहुंचकर बचाव कर लिया थाl इस तरह अराजकता का पर्याय हो चुकीं ममता बनर्जी और उनकी सरकार भी घटना पर चिंता तक नहीं जाहिर कर सकीl मालदा कांड उनकी विश्वसनीयता के ताबूत की आखिरी कील साबित हो सकती हैl क्योंकि यह हमला राजनीतिक नहीं, बल्कि न्यायलय पर है, वह भी सुप्रीम कोर्ट परl क्योंकि उसी के निर्देश पर कोलकाता हाई कोर्ट ने एसआईआर के काम में न्यायिक अफसरों को लगाया थाl ध्यान रहे कि कोर्ट के आदेश की अवहेलना पर हमला से 'मालदा कांड' देश का पहला बड़ा हमला है, जिसमें 9,30 घण्टे तक न्यायिक अफसर असुरक्षा में रहेl
यूपी में तीन दशक पूर्व सपा के शासन में इलाहाबाद हाईकोर्ट पर हुआ था हमला: पश्चिम बंगाल के मालदा की घटना से पूर्व उत्तर प्रदेश में वर्ष 1995 में जब बसपा सुप्रीमों मायावती ने सपा से समर्थन वापस लिया था, तब इलाहाबाद हाईकोर्ट पर सपा के हल्ला बोल कार्यकर्ता धावा बोल दिये थेl उस घटना के तत्काल बाद मुलायम सिंह यादव की सरकार बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगा थाl क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में गुंडे घुस गए थेl तब कानून व्यवस्था पहली बार देश के उत्तर प्रदेश में ध्वस्त हुई थीl
मालदा कांड पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- मालदा की घटना कृमिनल कंटेम्ट है: एसआईआर में लगे जिन सात न्यायिक अधिकारियों पर हमले हुए उनमें तीन तो महिला अफसर थींl उन्हें कार्य स्थल से केंद्रीय सुरक्षा बल जब बाहर ले जाने लगे तब उनपर किये गए पथराव ने अराजकता की चरम सीमा पार कर दीl इस घटना ने कश्मीर में दशकों तक चले पथराव की यादें ताजा कर दीl कोर्ट के ही निर्देश पर इस मामले की जांच 'एन आई ए' को सौंपी जाने की खबर पश्चिम बंगाल के उन वोटरों के दिल पर मरहम का काम कर सकती है जो हिंसा से डरते और बचते हैंl बाकी अगले एपिसोड मेंl


