पश्चिम बंगाल का चुनावी महाभारत: अब सत्ता परिवर्तन की निर्णायक भूमिका में आईं महिलाएं!
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कैलाश सिंह-
राजनीतिक संपादक
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-विस चुनाव का अंतिम फेज: सीटें 142, प्रत्याशी 14 सौ से अधिक, मतदाता लगभग तीन करोड़ 45 लाख, फैसला आधी आबादी पर निर्भरl ग्रामीण महिलाओं तक पहुंची बदलाव की बयारl
-आर्जिकर मेडिकल कॉलेज की प्रशिक्षु डॉक्टर की हत्या- रेपकांड ने महिलाओं में बढ़ाई असुरक्षा की भावना, भाजपा प्रत्याशी बनी मृतका की मां के आँसू टीएमसी के मुखर प्रचार पर भारीl
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कोलकाता, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l पश्चिम बंगाल के दूसरे व अंतिम चरण के लिए 29 अप्रैल को मतदान होना हैl रक्तरंजित बवाल के मद्देनज़र निर्वाचन आयोग ने केंद्रीय सुरक्षा व पुलिस बल और अर्ध सैनिक बलों की संख्या लगभग ढाई लाख तैनात कर दिया हैl यदि बग़ैर खून बहे हल्की झड़पों में शांतिपूर्ण ढंग से यह चुनाव बुधवार को सम्पन हो जाए तो छह दशक पूर्व हुए चुनाव का रिकॉर्ड टूटेगाl खासकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सभाओं में सहमे वोटरों को जिस तरह आश्वस्त किया कि चुनाव बाद दो महीने यानी 60 दिन यह पुलिस बल पश्चिम बंगाल में बना रहेगा, उससे सहमे जन मानस को पिछले इतिहास के मद्देनज़र राहत अवश्य मिली है जिसका संकेत जन चर्चाओं में मिल रहा हैl अन्यथा वास्तविक 'महाभारत' में 18 दिन में कई अक्षौणी सेना खत्म हो गई थी, लेकिन पश्चिम बंगाल का चुनावी महाभारत खत्म होने के बाद भी दशकों से रक्तरंजित इतिहास समेटे हैl
दरअसल वर्ष 2011 में सीपीएम से सत्ता छीनने के बाद ममता बनर्जी ने गुंडागर्दी वाला सिस्टम ऐसे अपनाया कि यहां का पुलिस -प्रशासन टीएमसी कार्यकर्ताओं के इशारे पर संचालित होने लगाl सभी विवाद थानों- तहसीलों की बजाय टीएमसी के दफ्तरों में हल किए जाने लगेl यहीं से 'कट मनी' का उदय हुआl सरकारी या केंद्रीय योजनाओं की रकम में बन्दरबांट के बाद बची रकम पर घुसपैठियों का डाका पड़ने लगाl देश की आजादी के बाद कोलकाता यानी इस प्रांत की राजधानी में जितने कल- कारखाने व रोजगार के साधन थे उतने विरले राज्यों में भी नहीं थेl लेकिन रोजगार उसी रफ़्तार में खत्म होते गए जिस तेजी से यहां की आबादी बढ़ती गईl घुसपैठियों और अराजकता की चरमसीमा तब पार होने लगी जब महिलाओं में असुरक्षा की भावना बलवती हुईl
भाजपा ने दीदी की टीएमसी के कोर वोटबैंक के मर्म को छू लिया: पिछले चुनावों में अपनी कमजोरी को पहचानकर उसे सुधारते हुए भाजपा ने टीएमसी के 'कोर वोटबैंक महिला' में सुरक्षा की भावना जगाकर अपने पाले में तब कर लिया जब ममता बनर्जी की सरकार उनके चीर हरण की हिमायती बनी नज़र आ रही थीl यह वही मौका था जब आर्जिकर मेडिकल कॉलेज की प्रशिक्षु डॉक्टर की रेप के बाद हत्या हुई थी और ममता सरकार आरोपियों के बचाव में खड़ी थीl इसके विरोध में बंगाल का प्रबुद्ध वर्ग 'भद्र लोक' सड़क पर उतर गयाl इस चुनाव में भाजपा ने उसी मृतका की मां को प्रत्याशी बना दियाl प्रचार में उन्होंने कोई भाषण नहीं दियाl उनके साथ गिनती के लोग चलते रहे और उनसे मिलने वाले पुरुष और महिलाओं की आँखें उन्हें देखते ही छलकती रहींl यह था मूक प्रचार जो वोटरों के दिल में सीधे उतरता चला गयाl
इस चुनावी महाभारत में राजनीतिक विश्लेषकों एस पांडे व आर ए सिंह के अलावा ग्राउंड रिपोर्टिंग में लगे 'तहलका संवाद' के वरिष्ठ पत्रकारों संतोष कुमार सिंह व प्रशांत त्रिपाठी का निष्कर्ष है कि मुस्लिम वोटरों के ध्रुवीकरण की बात महज डफली हैl उनके दिमांग में एक बात गहरे बैठा दी गई है कि भाजपा को हराने वाली पार्टी को ही वोट देना हैl यही कारण है कि उनकी कोई पार्टी आज तक निश्चित नहीं हुईl जनसंख्या बढ़ाने और फ़िर सत्ता में भागीदारी उनका खास मकसद होता तो वह असदुद्दीन ओवैसी जैसों के साथ खुलकर खड़े होते और वोटों के सौदागरों से अवश्य बचतेl यहां का वोटर तो भयमुक्त हो गया है, लेकिन अब आप बुधवार 29 अप्रैल को होने वाले अंतिम चरण के मतदान का दिल थामकर इंतजार कीजिएl इसके बाद चुनावी रुझान की 'सही- गलत' अफवाहों में गोते लगाते हुए चार मई तक फाइनल रिजल्ट के लिए धैर्य रखिएl



