राजनीतिक दलों में चल रही 'टूट से सहमे दिग्गज नेता' अपनी पार्टियों की रखवाली में जुटे!
---------------------------------------
कैलाश सिंह-
राजनीतिक संपादक
---------------------------------------
-सबसे पहले आम आदमी पार्टी टूटी, केजरीवाल ने दावा किया था कि कोई मेरी पार्टी तोड़कर दिखाये, फ़िर भी टूट गईl इसके बाद टीएमसी को अजेय बताने वाली ममता बनर्जी खुद की विस सीट भी हार गईंl उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना तो दूसरी बार टूट गईl इससे पूर्व शरद पवार की पार्टी एनसीपी भी दो धड़े में बंट चुकी हैl अब सपा के टूटने की अफवाह को लगे पंखl राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र ही नहीं देश के हर राज्य की वंशवादी पार्टियों में बढ़ी हलचल से सियासी पारा मौसमी तापमान से जुगलबन्दी करता नज़र आ रहा हैl
---------------------------------------
दिल्ली/कोलकाता/लखनऊ, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव बाद जो परिदृश्य नज़र आ रहा है वह तमाम राजनीतिक दलों के लिए किसी डरावने से कम नहीं हैl बंगाल जैसा दृश्य इससे पूर्व किसी राज्य में नहीं दिखा थाl पहली बार यहां की पब्लिक ने पराजित पार्टी के नेताओं का विरोध करने के लिए 'अंडे' को अपना नया हथियार बनाया और 'चोर - चोर' का नारा बुलन्द किया जो एक महीने से जारी हैl दूसरी तरफ टीएमसी के दो तिहाई सांसदों की टूट के बाद महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना के नौ में से छह सांसदों की टूट ने देश में राजनीतिक तापमान को ऐसा बढ़ाया है मानो वह मौसम की तल्खी को मात देने के लिए जुगलबन्दी कर रहा हैl अब तो राष्ट्रीय फ़लक पर दो प्रमुख गठबंधन वाले दल 'एनडीए और इंडिया' के बीच राजनीतिक शतरंज का खेल होता नज़र आ रहा हैl
राजनीति में चल रहा है शह- मात का खेल: कहावत है कि दिल्ली के तख्त तक पहुँचने का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है और यहीं भाजपा को वर्ष 2024 में तगड़ी मात मिली थीl इस साल लोकसभा चुनाव का परिणाम चार जून को आने से पहले तीन-चार सौ पार का नारा देने वाले इस दल की हवा निकल गई थीl पार्टी को यूपी की 80 में से महज 33 सीट ही मिलीl उसी दौरान दिल्ली -लखनऊ में पावर सेंटर के लिए युद्ध चल रहा था और चुनाव के बीच तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के बयान- 'भाजपा को अब संघ जैसे संगठन' की जरूरत नहीं हैl इस वक्तव्य के बाद आरएसएस ने अपना हाथ खींचा तो पार्टी औंधे मुंह गिर गई थीl फ़िर भी मोदी को तीसरी बार सरकार बनाने के लिए नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू का साथ लेना पड़ा थाl निहितार्थ ये कि भाजपा ने खुद को मिली मात से सीख लेते हुए संघ प्रमुख को मनाया और फ़िर हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार होते हुए पश्चिम बंगाल में दुष्कर किंतु प्रचण्ड जीत हासिल कर लीl यहां उसके लिए 'हिंदुत्व कार्ड' कारगर साबित हुआl यहां केजरीवाल के फार्मूले से कई कदम आगे बढ़कर ममता बनर्जी, उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी व अन्य टीएमसी नेताओं का 'नूर' पब्लिक ने चार मई से उतारना शुरू किया जो अभी तक थमा नहींl इस बीच टीएमसी के दो तिहाई सांसदों की टूट ने उनकी कमर तोड़कर रख दीl अब हालत ये हो गई है कि जब तक 'इंडिया गठबंधन' बचाव की रणनीति के बारे में सोचता तब तक दूसरी बार महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना के दो तिहाई सांसद टूटकर एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना का रुख कर लिएl शह- मात के इस खेल में उलझा विपक्ष भाजपा पर खरीद -फ़रोख़्त की तोहमत लगाने में जुटा हैl इस बीच यूपी में ओपी राजभर द्वारा सपा में टूट का दावा (शिगूफा) ने राजनीतिक तापमान को ऊंचाई दे दी हैl
टूटने वाली पार्टियों के नेताओं को ले डूबा उनका अहंकार: भाजपा पर जनादेश को तोड़ने वाली पार्टी की तोहमत लगाने वाले इंडिया गठबंधन में कथित तौर पर जुड़े नेताओं को उनका ही बोया काटना पड़ रहा हैl महाराष्ट्र में शरद पवार के साथ उद्धव ठाकरे और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी व अभिषेक बनर्जी की हालत 'पानी बिन मछली' सरीखी हो गई हैl उन्होंने पिछले वर्षों में अपनी सत्ता लोलुपता के चलते दूसरे दलों का साथ छोड़ा थाl यानी 2019 में शिवसेना- भाजपा को महाराष्ट्र में मिले जनादेश को तोड़ने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर एनसीपी नेता शरद पवार ने गठबंधन को तोड़ दिया थाl बाद में उनकी पार्टी भी दो खंड हो गई लेकिन उनके साथ गए उद्धव ठाकरे की शिवसेना और उसका चुनाव चिन्ह भी एनसीपी की तरह चला गयाl अब फ़िर दोबारा उनकी पार्टी के नौ में से छह सांसदों के टूटने की खबर ने तो राजनीतिज्ञों के होश फाख्ता कर दिया हैl इन्हें सत्ता लोलुपता और अपने कार्यकर्ताओं व जनता से दूरी खा रही हैl इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के लिए 'गांधारी' बनना उनकी पार्टी टीएमसी के ध्वस्त होने का मूल कारण बनीl उनके 28 में से बीस सांसद और 80 में से 64 विधायकों का टूटकर जाना यह साबित करता है कि टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी की तानाशाही से जनता तो त्रस्त थी ही, पार्टी के प्रतिनिधि, कार्यकर्ता भी घुटन महसूस कर रहे थेl शायद ममता बनर्जी खुद भी बेबस थीं अभिषेक के सामनेl इस दल के कार्यकर्ता भी अपने नेता से नहीं मिल पाते रहेl खुद ममता बनर्जी भी जिस कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई थीं आज उसी दल के आगे फ़िर नाक रगड़ती नज़र आ रही हैंl यानी इन्हें भी अहंकार और तानाशाही ले डूबीl
अब तीसरे नेता और उनकी पार्टी भी उसी राह पर: यूपी में सपा सुप्रीमों कई बार अपने दिए गए बयानों को लेकर राहुल गाँधी से जुगलबन्दी करते नज़र आते हैंl जब पश्चिम बंगाल में विस चुनाव हो रहा था और प्रचारक कम्पनी 'आई पैक' केंद्रीय जांच एजेंसियों के निशाने पर आई तभी उन्होंने यूपी में सपा के लिए उस कम्पनी से यह कहकर नाता तोड़ लिया कि हमारे पास उतने रुपये नहीं हैं जितना 'आई पैक' की डिमांड हैl यहां की जनता भी समझ गई कि बग़ैर पैसे के उस कम्पनी से कैसा 'करार' किया था! अब सपा में टूट का शिगूफा ही सही, लेकिन कहीं तो आग सुलग रही है जिसका धुँआ ओमप्रकाश राजभर की नाक से बाहर निकल रहा हैl
वोट दिलाने में सक्षम नेता का ही होता पार्टी पर नियंत्रण: यूपी में अगले साल होने वाला खेला अभी से शुरू हो गया हैl 1992 में बनी समाजवादी पार्टी के पहली बार टूटने की चर्चा यदि सच साबित हुई तो उसके सांसद व अन्य नेताओं के लिए सुरक्षित ठिकाना बसपा के होने की संभावना जताई जा रही हैl यही पार्टी सपा के मुस्लिम वोटबैंक का बड़ा हिस्सा भी अपनी तरफ खींच सकती हैl अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव के लिए बसपा का टिकट पाने वालों का रुझान भी बढ़ने लगा हैl यदि सपा से टूटकर दो तिहाई सांसद बसपा में गए तो इसका भी फायदा बीजेपी यानी एनडीए को संसद में मिलेगा, क्योंकि किसी विधेयक के लिए वोटिंग में बसपा ने समर्थन करने की बजाय उसमें शामिल ही नहीं हुई तो भी भाजपा का काम बन जाएगाl
निहितार्थ: राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो देशभर के तमाम क्षेत्रीय दलों में हो रही टूट का फायदा निःसंदेह भाजपा और एनडीए को मिलता दिख रहा हैl लोकसभा के मानसून सत्र से पूर्व यदि दलों के टूटने की रफ़्तार यही रही तो संसद में यही बढ़त कई अधूरे विधेयकों के पास होने का कारण बनेगाl इसके अलावा कोई और विधेयक भी पास हो सकता है जो देश में राजनीतिक पैमाना बदलने का द्योतक बन सकता हैl

