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 पश्चिम बंगाल: अत्याचार पर भारी पड़ रहा पब्लिक का प्रतिकार! 

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कैलाश सिंह-

राजनीतिक संपादक

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-जनाक्रोश का वेग पानी के बहाव यानी सैलाब से ज्यादा घातक होता हैl देश में इसका अकेला और ताज़ा उदाहरण पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा हैl टीएमसी को सत्ता से उखाड़ कर फेंकने के दो महीने बाद भी पब्लिक का आक्रोश नहीं थम रहा हैl यहां 'अण्डे के हमले से बमबाज' भी सहम गए हैंl यही हाल रहा तो अगले तीन महीने बाद होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव में टीएमसी को प्रत्याशी भी मिलने कठिन हों तो हैरत नहीं होनी चाहिएl मतलब यह कि 'ममता बनर्जी' नाम का ब्रांड खत्म हो चुका हैl अब वह यदि नई पार्टी भी बना लें फ़िर भी उनका और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का चेहरा आमजन के जेहन से उतर चुका हैl

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लखनऊ/कोलकाता, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l डेढ़ दशक अर्थात 15 साल तक 'डर और लूट' के साये में जीने वाले लोगों को हर कार्य के लिए निजी टोल, कट मनी, रेप, कत्लेआम असुरक्षा, सुविधा विहीन जीवन- यापन करने वाले पश्चिम बंगाल के नागरिक विगत चार मई को मतगणना के दिन भी ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की पराजय और भाजपा की प्रचण्ड जीत पर एकबारगी भरोसा न होने पर लोग एक- दूजे को चिमटी काटे कि कहीं यह 'दिवा स्वप्न' तो नहीं हैl इसीसे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उनमें कितनी दहशत थी जो सत्ता जाने के बाद आक्रोश के रूप में परिवर्तित हो गई हैl वही जनाक्रोश टीमसी के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं पर अंडे की शक्ल में दो माह से बरस रहा हैl तृणमूल कांग्रेस पार्टी टूट गई हैl इस पार्टी का नाम और सिम्बल भी जा सकता है लेकिन यह कोई नई बात नहीं होगीl यदि नेता जनाधार वाला होता है तो वह नई पार्टी खड़ी करके अपना अस्तित्व कायम कर लेता है, लेकिन ममता बनर्जी वह भी करने में अक्षम दिख रही हैंl क्योंकि उनके 'चेहरे का ब्रांड' और पार्टी का कथित जनाधार भष्मीभूत हो चुका हैl इसको किसी ग़ैर ने नहीं, उनके ही भतीजे अभिषेक बनर्जी ने जलाया है और वह 'महाभारत की गांधारी' बनी रहींl अभिषेक बनर्जी अपने लूटतंत्र के जरिए पार्टी और उसकी मुखिया दोनों के लिए भष्मासुर साबित हुएl


सीएम सवेंदु अधिकारी बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से कायम कर रहे कानून व्यवस्था: पश्चिम बंगाल में कांग्रेस शासन को हटाकर सीपीएम ने दशकों तक राज किया, फ़िर भी कांग्रेस ने यहां कुछ सीटें जीतकर अपना अस्तित्व बनाए रखाl वर्ष 2011 में जब ममता बनर्जी अपनी पार्टी टीएमसी के जरिए सत्ता में आईं तो उन्होंने सीपीएम के कथित गुंडातंत्र और लूट को आधार बनाकर सत्ताधारी दल को पराजित किया, लेकिन जब सत्ता संचालन शुरू किया तो सीपीएम के ही कैडर को अपना लिया और पार्टी संचालन का जिम्मा अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को सौंप दियाl इसके बाद तो पार्टी की 'कट मनी, निजी टोल प्लाजा, विपक्षी दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं ही नहीं, उनके कोर वोटरों के घरों पर धमकी सहित बम फूटने लगेl विगत चार मई से अब तक दो महीने में सवेंदु अधिकारी ने कानून व्यवस्था कायम करने, महिलाओं की सुरक्षा के साथ जिस तरह अपराधियों के लिए उनकी पुलिस यमराज बन रही है उसे विपक्षी पार्टियां यूपी के योगी आदित्यनाथ का मॉडल बताकर उसका विरोध कर रही हैंl जबकि पश्चिम बंगाल आठ दशक पुराने अपने 'औद्योगिक वर्चस्व' को फ़िर कायम करने की तरफ़ अग्रसर हैl किसी भी राज्य में बेहतर निवेश के लिए बिजली, पानी, सड़क से ज्यादा महत्वपूर्ण कानून व्यवस्था होती हैl इसमें भाजपा सरकार के सीएम सवेंदु अधिकारी मन्जिल की तरफ़ बुलेट ट्रेन सरीखे बढ़ रहे हैंl ध्यान रहे कि बिहार में जंगलराज का खात्मा कर विकास और कानून राज स्थापित करके ही जद यू नेता नीतीश कुमार 'सुशासन बाबू' कहलाये' थेl पश्चिम बंगाल में आमजन के धीरे- धीरे निकल रहे आक्रोश को यदि सवेंदु अधिकारी ने रोकने का प्रयास एक झटके में करेंगे तो खुद उनके व पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता हैl यह तो गनीमत है कि पश्चिम बंगाल जैसे प्रांत में जहां आलू और टमाटर सरीखे बम नज़र आते थे वहां की जनता अपने उबलते आक्रोश को शांत करने के लिए अंडे को हथियार बनाये हैl अन्य नेताओं की बात तो दूर जब ममता बनर्जी के प्रदर्शन में अंडे से हमला होने का मतलब है कि पब्लिक का गुस्सा दो महीने बाद भी शांत नहीं हुआ हैl


कहीं ममता बनर्जी की राजनीतिक पारी के अस्तित्व पर संकट तो नहीं! राजनीतिक विश्लेषक 'एस पांडे' कहते हैं कि जिस तरह विगत दिनों ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में एक रेपिस्ट के कथित पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने के विरोध में प्रदर्शन करने को सड़क पर आईं और पब्लिक ने उनपर अंडे से हमला कर दिया उससे तो यही लग रहा है कि राज्य की अधिकतर जनता उन्हें अब किसी भी रूप में देखना नहीं चाहती हैl यदि यह सिलसिला लम्बे समय तक कायम रहा तो उनकी राजनीतिक पारी पर खात्मे का संकट घने काले बादल की तरह अवश्य मंडरा रहा हैl इतना ही नहीं, आने वाले तीन महीने बाद स्थानीय निकाय चुनाव में उन्हें यदि कोई प्रत्याशी न मिले तो हैरत भी नहीं होनी चाहिएl वर्तमान समय में जो स्थिति दिख रही है उससे तो यही लगता है कि ममता बनर्जी का फ़ायर ब्रांड चेहरा अब पब्लिक की नज़र में धुंधला पड़ रहा है जो उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए खतरनाक संकेत हैl क्योंकि यही 'अत्याचार का प्रतिकार' हैl


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