मिडिल ईस्ट का महायुद्ध: दुनिया में बढ़ेगी महंगाई, ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद भी अमेरिकी मंशा अधूरी!
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कैलाश सिंह-
राजनीतिक संपादक
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-ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के तुरन्त बाद सर्वोच्च नेता के तौर पर वहां के धर्मगुरु 'अयातुल्ला अलीरेज अराफी' को अंतरिम सुप्रीम लीडर बना दिया जाना यह साबित करता है कि 'ईरान' अमेरिका के सामने घुटने नहीं टेकेगा! वहां तख्ता पलट के लिए अमेरिका को ईरान में सिविल वॉर का ही इंतजार करना होगा!
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दिल्ली, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l पिछले साल जून महीने में ईरान पर अमेरिकी हमले से यही समझा गया कि वह किसी भी 'इस्लामिक देश' को परमाणु क्षमता संपन्न नहीं देखना चाहता हैl जबकि ईरान अपने लक्ष्य की तरफ़ तेजी से बढ़ रहा था जो इजराइल के अस्तित्व के लिए खतरा थाl जहां तक पाकिस्तान के परमाणु संपन्न होने का सवाल है तो उसमें दुविधा हैl क्योंकि भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' में उसके कई एयरबेस में से एक परमाणु शक्ति से लैस 'एयरबेस' ऐसा था जिसके तबाह होने के बाद वहां जीर्णोद्धार के लिए अमेरिकी विनान और सैनिकों की मौजूदगी ने इस दुविधा को पुख्ता कर दिया कि वह एयरबेस अमेरिका का हो सकता हैl इससे पूर्व पाकिस्तान लगातार भारत को परमाणु हमले की धमकी देता रहा हैl जबकि ईरान ने पिछले साल जून में अमेरिकी हमले के बाद भी 'यूरेनियम' को सुरक्षित रखते हुए उसमें लगातार वृद्धि करता रहा हैl रहा सवाल दुनिया में महंगाई का तो खाड़ी देशों से आने वाले पेट्रोलियम उत्पादों के लिए एक मात्र शार्टकट समुद्री रास्ता ईरान होकर गुजरता हैl यदि इसे उसने बाधित कर दिया तो दुनिया में महंगाई का बढ़ना तय हैl इसके संकेत शेयर बाजार और सोने- चांदी में मूल्य वृद्धि से मिलने भी लगा हैl
ईरान की 'बदले वाली धमकी' का असर: खाड़ी देशों में अमेरिकी एयरबेस अथवा सैन्य ठिकानों पर ईरान ने जो हमले जारी रखे हैं, उससे अमेरिका को होने वाले नुकसान के साथ इस्लामिक दुनिया दो फाड़ नज़र आने लगी हैl बल्कि यह मानें कि अधिकतर इस्लामिक देश जो सुन्नी समुदाय की बहुलता वाले हैं उन्होंने ईरान का साथ नहीं दियाl इतना ही नहीं, शिया धर्मगुरु रहे ईरान के सुप्रीम लीडर 'खामेनेई' का साथ अधिकतर खाड़ी देशों द्वारा न दिये जाने से यह भी समझा जा रहा है कि इस घटना ने इस्लामिक दुनिया को दो धड़े में बांट दिया हैl खामेनेई की मौत के बाद ईरान में जहां 40 दिन का शोक मनाया जा रहा है, वहीं भारत समेत दुनिया भर के शिया समुदाय के लोग कैंडिल मार्च निकालकर 'अमेरिका और इजराइल' के खिलाफ नारेबाजी करते हुए शोक मना रहे हैंl रहा सवाल ईरान में कुछ लोगों द्वारा खुशी मनाए जाने का तो इसे अमेरिकी 'नेरेटिव' माना जा रहा हैl जब तक वहां सत्ता का परिवर्तन अमेरिका के मन मुताबिक नहीं होता है तब तक हमलावर दोनों देशों की जीत नहीं कही जा सकती हैl
नया नेतृत्व भी झुकने को नहीं है तैयार: सपरिवार अयातुल्ला खामेनेई, उनके आर्मी चीफ व अन्य लीडर और कमांडर के मारे जाने के बावजूद ईरान की विधि विशेषज्ञ परिषद के सदस्य 'अलीरेज अराफी' को तीन सदस्यीय परिषद द्वारा अंतरिम नेतृत्व के जरिये सर्वोच्च नेता बनाया जाना और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन द्वारा यह कहा जाना कि हम खतरनाक बदला लेंगे यह साबित करता है कि ईरान इसी सत्ताक्रम के रहते कतई नहीं झुकेगाl अलीरेज अराफी के कमान संभालने के बाद अमेरिकी एयरबेस और इजराइल पर ईरानी हमले बढ़ गए हैंl
आखिर कब तक चलेगा यह महायुद्ध: फरवरी के अंत में अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत को कुर्बानी अथवा शहीद का दर्जा मानकर वहां तैयार दूसरे क्रम के बने लीडर 'अलीरेज अराफी' द्वारा देश में शोक के साथ खाड़ी देशों में स्थित 'अमेरिकी एयरबेस' पर किये जा रहे हमले इस महायुद्ध को कहां तक और कितने दिन तक खींचेंगे? इससे बढ़ने वाली महंगाई से दुनिया की अर्थव्यवस्था की दशा क्या होगी? यही सवाल हर देश को बेचैन किये हैl जहां तक ईरान के प्रबल समर्थक चीन से मदद मिलने का है तो उससे उम्मीद बेमानी हैl वह किसी भी देश का सहयोग कभी नहीं करता हैl उसकी अपनी विस्तरवादी नीति उसे ऐसा नहीं करने देती हैl रूस जरूर मददगार होता लेकिन वह खुद चार साल से युक्रेन से युद्ध में उलझा हैl उसे तो खुद ईरान से मिलने वाले सहयोग बन्द हो जाएंगेl भारत युद्ध नहीं बुद्ध के संदेश वाली नीति पर चल रहा हैl वह अपनी कुटिनीति का उपयोग देश की अर्थव्यवस्था सुधार में कर रहा हैl रहा सवाल पाकिस्तान का तो वह अमेरिका और ईरान के साथ 'डबल क्रास' करते हुए अफ़ग़ानिस्तान से युद्ध में फंस गया हैl लिहाजा अमेरिका, इजराइल के साथ ईरान का युद्ध अधिक दिनों तक तो नहीं चलेगा लेकिन जितने दिन चलेगा उतने दिन महंगाई को आसमान दिखाता रहेगाl
ईरान में यदि सिविल वॉर हुआ तो सत्ता परिवर्तन सम्भावित: अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद दुनिया में कुछ वीडियो जारी कर फैलाया गया कि ईरान के भी तमाम मुस्लिम शिया धर्मगुरु के मारे जाने से खुशी मना रहे हैं जिसे सच नहीं माना जा रहा हैl राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा होता तो अब तक वहां सिविल वॉर छिड़ गया होताl वहां 40 दिन के शोक में नया नेतृत्व महायुद्ध में तेजी नहीं ला पाताl यानी एक तरफ़ शिया समुदाय दुनिया भर में शोक मनाते हुए अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारेबाजी कर रहा है, वहीं नया नेतृत्व दोनों देशों पर हमले तेज कर दिया हैl

