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 एमएलसी का दंगल: भाजपा देश में भारी पर 'काशी' में हारी, संघ के गढ़ में भी मिली मात! 

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कैलाश सिंह

राजनीतिक संपादक

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-वर्ष 2024 में पीएम मोदी की जीत का अंतर कम होना पहली चेतावनी थीl अब विधान परिषद की पराजय ने भाजपा संगठन के प्रदेश नेतृत्व में निष्कृयता की फ़िर पोल खोल दीl

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दिल्ली/लखनऊ/वाराणसी, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l देश के राजनीतिक फ़लक पर निरंतर एक दशक से 'धार्मिक नगरी काशी' (वाराणसी) आसीन हैl पीएम मोदी के इसी संसदीय क्षेत्र से एमएलसी के चुनावी दंगल में भाजपा को दोनों सीट पर मिली तगड़ी पराजय पार्टी के संगठन में विगत संसदीय चुनाव से कायम 'निष्कृयता और उदासीनता' को दर्शाती है, जिसे पार्टी के लिए दूसरी चेतावनी के रूप में भी राजनीतिक विश्लेषक देख रहे हैंl राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गढ़ नागपुर से पिछली बार  जीते उस प्रत्याशी ने फ़िर विजय हासिल की है जिसके जरिए कांग्रेस का खाता खुल गयाl जबकि यूपी में मुख्य प्रतिद्वंद्वी सपा ने वाराणसी के साथ लखनऊ समेत पांच सीट पर भाजपा को पटखनी दी हैl हालांकि देश के चार राज्यों की कुल 28 सीट में 15 पर एनडीए ने परचम लहराया है, लेकिन काशी की हार विपक्षी दलों के लिए अयोध्या सरीखे बड़े नेरेटिव खड़े करने का आधार बन गई हैl 2024 से अयोध्या का जवाब आज तक भाजपा नहीं दे सकी हैl यूपी की बात की जाए तो यहां विधान परिषद की कुल सौ सीटों में 76 पर भाजपा और 10 पर सपा काबिज हैl जबकि 11 सीट पर हुए चुनाव में छह पर भाजपा और पांच सीटें सपा के खाते में गई हैं, जहां जश्न का माहौल हैl




पीएम के क्षेत्र में भाजपा को हराने का बनेगा नेरेटिव: 'तहलका संवाद' से हुई बातचीत में राजनीतिक विश्लेषक एस. पांडेय, डॉ अरविंद मिश्र और वरिष्ठ पत्रकार सै. हसनैन कमर 'दीपू' कहते हैं कि इस चुनाव का असर लोकसभा, विधानसभा पर तो खास नहीं पड़ेगा लेकिन यूजीसी और एससी/एसटी ऐक्ट के दुरूपयोग जैसे मुद्दे के असर से इनकार भी नहीं किया जा सकता हैl विगत लोकसभा चुनाव की तरह इस चुनाव में भी भाजपा के कमजोर रहे संगठन और समर्थकों में उदासीनता को दर्शाता हैl पार्टी की तरफ़ से तमाम पात्र लोगों का वोट तक नहीं बनवाया गया जो उसके कोर वोटर भी हैंl वहीं विपक्षी दल के प्रत्याशी और उनके पार्टी पदाधिकारी पूर्ण सक्रिय नज़र आयेl दिलचस्प तो ये है कि इस चुनाव में ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट और शिक्षक ही वोटर होते हैंl भाजपा ने मिशन 27 और 29 तक विपक्ष को बोलने के लिए नेरेटिव यानी तगड़ा मुद्दा दे दिया हैl यूपी में भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी केन्द्र में मन्त्री भी हैंl वह पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी की ही पगडंडी पर अब तक चलते नज़र आये हैंl हालांकि उन्होंने प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 29 अक्टूबर को समीक्षा बैठक की है लेकिन नहीं लगता है कि हार में किसकी जवाबदेही तय होगी और उसपर कोई कारवाई होगीl यदि नतीजे के आधार पर कमी खोजी गई तो पार्टी को 2024 से कायम निष्कृयता स्पष्ट हो जाएगीl





 वाराणसी निर्वाचन क्षेत्र में विपक्षी ने अपात्रों को बनवा दिया वोटर: 'तहलका संवाद के डिजीटल विंग' से हुई बातचीत में ठोस सुबूत के साथ 2020 में शिक्षक एमएलसी के निर्दल प्रत्याशी रहे माध्यमिक शिक्षक संघ के एक गुट के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष और 2025 से संरक्षक रमेश सिंह का दावा है कि उन्होंने सपा प्रत्याशी द्वारा हजारों उन लोगों को वोटर बनवाया गया जो वित्त विहीन विद्यालयों की फर्जी लिस्ट में शिक्षक के तौर पर दर्शाए गए थेl इसकी शिकायत डीएम, कमिश्नर, निर्वाचन आयोग यूपी और केंद्रीय निर्वाचन आयोग के अलावा भाजपा के जिला संगठन के अलावा प्रदेश महामन्त्री व संगठन प्रभारी संजय राय से भी की थी, लेकिन किसी ने संज्ञान नहीं लियाl केवल डीएम ने संज्ञान लिया और जवाब भी दियाl जवाबी पत्र में उन्होंने भी माना कि तमाम कथित शिक्षक ऐसे पाए गए जिनका कोई रिकार्ड उनसे सम्बन्धित विद्यालयों में नहीं मिलाl इस पत्र की कॉपी स्टोरी के साथ यथावत लगी हैl उन्होंने बताया की इस बार वह भाजपा से टिकट पाने की कतार में होने के साथ क्षेत्र में भी सक्रिय थेl उन्होंने यह भी माना कि टिकट पाने के चक्कर में पार्टी की परिक्रमा में लगे प्रत्याशियों को क्षेत्र में सक्रिय रहने का समय नहीं के बराबर मिला, नतीजा हार के रुप में सामने हैl


कांग्रेस पर भाजपा का तंज रिजल्ट आते ही धवस्त: एमएलसी चुनाव की मतगणना में कांग्रेस को एक भी सीट पर बढ़त न मिलने से उत्साहित भाजपा ने (जीरो- 0) को लेकर तंज करना शुरु कर दिया था लेकिन उस तोहमत को नागपुर के पार्टी प्रत्याशी ने जीत हासिल करके मिटा दिया और कांग्रेस का यहां से खाता भी खुल गयाl विदित हो कि नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय हैl स्वयंसेवक भाजपा के संगठन कार्यकर्ता नहीं होतेl वह तो जनमानस के बीच राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करते हैंl यहां से भी सत्ताधारी दल की हार का सीधा मतलब भाजपा की सांगठनिक कमजोरी को दर्शाता हैl इसका दिलचस्प पहलू ये है कि वर्ष 2020 से पहले यह चुनाव राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में नहीं होता था, क्योंकि यह शिक्षकों व स्नातक, परा स्नातक वोटरों के बीच का चुनाव होता थाl पिछली बार पार्टियों ने समर्थन दिया थाl अबकी पार्टियां टिकट और सिम्बल देने लगींl इस मामले में सपा का संगठन और प्रत्याशी भाजपा पर भारी पड़ गए और यूपी में नतीजा टक्कर का हो गयाl

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