दिल्ली के रामलीला मैदान में मुद्दा विहीन नज़र आया भारत का विपक्ष!
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कैलाश सिंह/हसनैन कमर दीपू
राजनीतिक संपादक/विश्लेषक
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-तहलका संवाद का विश्लेषण:- जनतंत्र बचाने के नाम पर उसी से लड़ रही है कांग्रेस: वोट चोरी का मुद्दा 2029 तो दूर, 2027 में सात राज्यों वाले चुनाव के लिए भी कारगर नज़र नहीं आ रहा! यूपी से मैदान छोड़ भागे सपा सुप्रीमों बाबा बागेश्वर 'धीरेंद्र शास्त्री' के पीछे पड़ेl
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दिल्ली/लखनऊ, (तहलका न्यूज नेटवर्क)l एक नवम्बर रविवार के दिन जब दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के आह्वान पर इंडिया ब्लॉक से जुड़े 20 राजनीतिक दलों के लोग जुटे तो लगा कि 50 हज़ार क्षमता वाला यह मैदान जनसैलाब से लबालब होगा, लेकिन उपस्थित जन समूह में ज्यादातर को पता ही नहीं था कि वह किस लिए आये हैंl बग़ैर सुबूत वाले इस मुद्दे पर भी सभी पार्टियों के नेताओं द्वारा 'अपनी ढपली- अपना राग' अलापा गयाl
दिलचस्प पहलू तो ये है कि जिस राहुल गाँधी के भरोसे इंडिया ब्लॉक के नेता जुटे थे वह 16 से 19 नवम्बर तक यूएस में छुट्टी बिताने जाएंगे, जबकि 17 नवम्बर को इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में बहस की तारीख हैl राजनीतिक विश्लेषकों एस. पांडेय, डॉ अरविंद मिश्र के मुताबिक 'वोट चोरी' का मुद्दा विपक्ष की ही दो बातों से खंडित होता नज़र आ रहा हैl इसे देश की जनता तो समझ गई है लेकिन कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों की समझ से परे लग रहा हैl उनके पास दूसरा कोई ठोस मुद्दा भी नहीं दिखाl राहुल गाँधी ने रैली में जिस तरह इस मुद्दे को जनता के हवाले किया, उसी तरह नया नारा या मुद्दा 'यूजीसी और एस सी/ एस टी ऐक्ट के दुरूपयोग रोकने पर देते तो शायद उन्हें सवर्णों का भी भरपूर साथ मिलता जो 2029 तक चुनावी समर में उनके लिए मजबूत स्तम्भ बना रहताl यही कारण है कि रामलीला मैदान भी बोल पड़ा- 'कि जिस वोट चोरी के सहारे जनता की अदालत में राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हो वह 17 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट में सुबूत मांगेगाl हालांकि उस दिन राहुल गाँधी विदेश में होंगे और उनके वकील शायद अगली तारीख मांगेंगेl
राहुल गाँधी का हठयोग कहीं पार्टी व सहयोगी दलों पर भारी न पड़ जाए: शायद राहुल गाँधी को रामलीला मैदान में दिखे जन समूह से समझ आ गई कि रैली फ्लॉप हो गई, लेकिन वह कैसे कहें, उन्होंने उपाय निकाला कि यह मुद्दा हम जनता की अदालत पर छोड़ते हैं, लेकिन उन्होंने किसी नये मुद्दे का जिक्र भी नहीं कियाl अब सवाल उठता है कि वोट चोरी के मुद्दे पर दो बातें कैसे संभव है? कांग्रेस का दावा है कि पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह वोट की चोरी से पद पर आसीन हुएl यदि 2024 के संसदीय चुनाव में वोट चोरी हुई तो किसने की? ज्ञानेश कुमार तो जनवरी 2025 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनेl फ़िर चुने गए सभी सांसद उसी आरोप के कटघरे में होंगेl अब रहा सवाल सीईसी को हटाने का तो वह केवल संसद में महाभियोग लाकर ही संभव हैl अब 'एसआईआर' पर आयें तो यह बिहार विधान सभा चुनाव से पूर्व शुरू हुआ और अब तक जारी हैl अगले साल 2027 में सात राज्यों के विधान सभा चुनाव होने हैं और कांग्रेस समेत इंडिया ब्लॉक के सभी दल उन्हीं 13 करोड़ वोटरों के काटे जाने की बात रैली में भी दोहराते रहेl शायद उन्हें अभी तक यह बात समझ नहीं आ रही है कि कटे वोटों में विस्थापित, मृत और घुसपैठिये भी हैं, जिसपर पश्चिम बंगाल का चुनाव ममता बनर्जी भी हार चुकी हैंl इन्हीं बांग्लादेसी, रोहिंग्या को लेकर भाजपा बड़ा मुद्दा बनाकर चुनाव दर चुनाव जीत रही हैl
राहुल गाँधी मोदी और शाह से कैसे लड़ेंगे? पार्टी सूत्रों की मानें तो राहुल फ़िर छुट्टी बिताने विदेश जा रहे हैंl वह 16 से 19 नवम्बर तक शिकागो व न्यूयार्क में जेनजी का उत्साह बढ़ाएंगेl एक तरफ़ वह देश की राजनीति में खास मौकों पर छुट्टी बिताने जाते हैं और दूसरी ओर मोदी और शाह फुल टाइम देश की जनता को समय दे रहे हैंl बावजूद इसके वह सड़क से लेकर नकली संसद में अपने असली सांसदों के साथ 'माक संसद' चलाकर भाजपा सरकार को सवाल- जवाब वाली चर्चा के लिए चैलेंज दे रहे हैंl उनकी फ़िर विदेश यात्रा शायद सुप्रीम कोर्ट में होने वाले सवालों से भागने वाली मानी जा सकती हैl जब 17 नवम्बर को वह यूएस में रहेंगे तो वकील बोलेगा कि हमारे कलाइंट देश से बाहर हैं, कृपया अगली डेट दे देंl इसी तरह कांग्रेस जो नकली संसद चला रही है उसकी बजाय उसे असली संसद में जवाब देना चाहिएl क्योंकि दस्तावेज स्थाई होता है चाहे उसे कोर्ट की एफिडेविड में देना हो या संसद में पूछे जाने वाले सवाल -जवाब का होl
चुनावी पाले के बाहर से अखिलेश यादव ने बाबा बागेश्वर कायदे से घेरा: यूपी का चुनावी मैदान छोड़ने की घोषणा करने वाले सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल तो गिरा दिये लेकिन उन्होंने सनातन को तोड़ने वाले फार्मूले पर बाबा बागेश्वर (धीरेंद्र शास्त्री) को कायदे से ऐसा घेरा कि बाबा को माफ़ी तक मांगनी पड़ गईl विदित हो कि हाल ही में अखिलेश यादव ने बयान दिया था कि -जब हम विधान सभा चुनाव नहीं लड़ते हैं और सांसद रहते हैं तब सीएम बनते हैंl उनके इस बयान से ऐसा जाहिर तो हो रहा है कि मानो वह कई बार के सीएम होंl ऐसा एक बार हुआ वर्ष 2012 मेंl उन्हें यह पद विरासत में मिला थाl वह विरासत उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने थाल में सजाकर दी थीl जबकि वह खुद सीएम रहते हुए 2017 में चुनाव लड़े और हार गएl सपा को 2022 में भी पराजय मिलीl अब मिशन 27 में चुनावी मैदान से खुद को बाहर रखने वाले अखिलेश यादव के कार्यकर्ताओं के लिए वैसी ही स्थिति होगी जैसे बिना नायक वाली सेना का होता हैl
अखिलेश यादव सनातन और मुस्लिम वोट को साधने में जुटे: उन्होंने बाबा बागेश्वर को श्रीकृष्ण के चरित्र विवेचना में कायदे से घेर लिया लेकिन वह अयोध्या के राम मन्दिर में अभी तक दर्शन - पूजन को नहीं गएl यदि उन्हें संपूर्ण मुस्लिम वोट चाहिए तो 'उदय निधि स्टालिन' की राह पर चलना पड़ेगा, जिसने सनातन संस्कृति को डेंगू और मलेरिया बताकर उसके उन्मूलन की बात कही थी, या फ़िर सनातनी वोट चाहिए तो उन्हें गोरक्ष पीठादीश्वर व सीएम योगी आदित्यनाथ का मथुरा वाला या अपना अयोध्या से चुनाव लड़ने वाला चैलेंज स्वीकारना होगाl रहा सवाल बाबा बागेश्वर की श्रीकृष्ण पर विवेचना का तो भागवान कृष्ण एक नाम त्रिभंगी भी हैl विपक्ष को लगा कि सनातन का रथ लेकर चलने वालों में एक बाबा बागेश्वर द्वारा श्रीकृष्ण को 'टेढ़े मेढ़े' बताना बेहतरीन मुद्दा हाथ लगा हैl बाबा ने मनोभाव की सफाई देते हुए माफ़ी मांग और मुद्दा कमजोर पड़ गयाl
ओवैसी का फंडा सबसे क्लियर: राजनीतिज्ञों में असदुद्दीन ओवैसी ही ऐसे नेता हैं जिनका 'धर्म और राष्ट्र' को लेकर सबसे बिंदास मत नज़र आता हैl वह अपने मजहब से जिस तरह कोई समझौता नहीं करते हैंl उसी तरह राष्ट्रवाद के मुद्दे पर उनके लिए राष्ट्र प्रथम हैl इसे वह राजनीति में कतई घालमेल नहीं करते हैंl इसके लिए वह विपक्षी दलों के तंज 'भाजपा की बी टीम' कहे जाने पर भी विरोध नहीं करते हैंl बिहार विस चुनाव से उनका नारा- 'अब अब्दुल्ला दरी नहीं बिछाएगा, उसे सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए'l उनका यह तीर चुनावी समर में विपक्षी पार्टियों की पराजय का अहम अस्त्र साबित होने लगा हैl राज्यसभा चुनाव में यदि सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ने दो में से एक टिकट किसी मुस्लिम नेता या आजम खान के किसी परिजन को दे दिये होते तो ओवैसी का हमला मिशन 27 में उनके खिलाफ भोथरा साबित होताl


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